Monday, 19 December 2016

ईश्वर में विश्वास

एक बार मेरा एक अनोखी बहस से सामना हो गया। एक व्यक्ति को ईश्वर में विश्वास नहीं था। वो बोला, 'मुझे ईश्वर में विश्वास नहीं है।' मैंने उसे समझाया, 'ईश्वर में विश्वास हमारा विश्वास सर्वभौम में होने से ही नहींं है, इससे अर्थ हमारी हमारे पूर्वजों के प्रति आस्था में भी है। हमारे पूर्वज एक नियम और एक धर्म को मानते आयें हैं। उनका विश्वास था कि उनके वंशज भी धर्म को इसी प्रकार से निभायेंगे। उनके इसी विश्वास के प्रति आस्थावान होकर धर्म के प्रति निष्ठावान होना ईश्वर में विश्वास होना ही चाहिये।'
बहुधा कहें या यदाकदा कुछ ऐसे तर्कों से भी सामना होता है कि क्या गलत को भी मानना चाहिये? गलत...गलत क्या है? ईश्वर में विश्वास से गलत क्या होता है? ईश्वर में विश्वास केवल मूर्ति, पुस्तकों और यम-नियमों में ही नहीं होता है। ईश्वर में विश्वास से अर्थ है स्वयं में विश्वास। स्वयं में विश्वास की बात ही हमारे धार्मिक ग्रंथ भी कहते हैं- अहम ब्रम्हास्मि।
स्वयं में विश्वास ही ईश्वर में विश्वास है और ईश्वर में विश्वास का अर्थ है स्वयं की सत्ता में विश्वास करना। मैं मिथ्या नहीं...सत्य हूं...इस अनुभूति से सराबोर होना भी ईश्वर के प्रति आस्थावान होने के समान ही है।
धर्म वो है जो हमारे सनातन के समान सभी में समान आत्मा देखते हुए आदेशित करता है कि आओ हम सब मिलकर आनंद मनायें...समान रूप से ओज का अभिवर्धन करें...सभी मिलकर अपने जीवन को धन्य बनायें और एक ऐसे विश्व का निर्माण करें जहां सभी अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ देकर अपने जीवन को सार्थक करें। पूर्णत्व पायें और मोक्ष पाकर उस अनंत ईश्वर का अंश बन जायें।
यही जीवन का मूल उद्देश्य है और यही धर्म का भी मूल उद्देश्य है, हमें श्रेष्ठतम बनाकर पूरे विश्व का कल्याण करना।